सरस्वती पूजन पाठ एवं मन्त्र जप

मूल: मां सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी आदि कई नामों से भी जाना जाता है। ब्रह्माजी ने माता सरस्वती की उत्पत्ति वसंत पंचमी के दिन की थी, यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती का जन्मदिन मानकर पूजा-अर्चना की जाती है।

Origin:Maa Saraswati is also known by many names like Bagishwari, Bhagwati, Sharda, Veenavadini and Vagdevi. Lord Brahma originated Mata Saraswati on the day of Vasant Panchami, that is why every year, on the day of Vasant Panchami, worship is done as the birthday of Goddess Saraswati.

पाठ के लाभ:मान्यता है कि कलयुग में जो देवी दुर्गा के सरस्वती स्वरूप को प्रसन्न कर लें उसके लिए तीनों लोकों सभी वस्तुएं आसानी से प्राप्त हो जाती हैं। अगर आपके बच्चें का पढ़ाई में मन नहीं लगता या आप खुद अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहें हैं तो मां सरस्वती की पूजा करना आपके लिए काफी लाभदायक सिद्ध होगा।

Benefits of Pooja: It is believed that for the Goddess Durga who is pleased in the Kali-yuga, all the things of the three worlds are easily obtained for her. If your children do not feel like studying or you are unable to complete your studies yourself, then worshiping Maa Saraswati will prove to be very beneficial for you.

पौराणिक मान्यता: पौराणिक कथा अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में पितामह ब्रह्मा ने अपने संकल्प से ब्रह्मांड की तथा उनमें सभी प्रकार के जंघम-स्थावर जैसे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी मनुष्यादि योनियो की रचना की। लेकिन अपनी सर्जन से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है।

तब ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने अंजली में लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान श्री विष्णु की स्तुति करनी आरम्भ की। ब्रम्हा जी के किये स्तुति को सुन कर भगवान विष्णु तत्काल ही उनके सम्मुख प्रकट हो गए और उनकी समस्या जानकर भगवान विष्णु ने मूलप्रकृति आदिशक्ति माता का आव्हान किया। विष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण मूलप्रकृति आदिशक्ति वहां तुरंत ही ज्योति पुंज रूप मे प्रकट हो गयीं तब ब्रम्हा एवं विष्णु जी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया।

Mythological belief: According to the mythological belief, in the early period of creation Pitamah Brahma created the universe with his resolve and created all kinds of junga-sthwar like trees, plants, animals and birds. But he was not satisfied with his surgeon, he felt that there was something missing due to which there was silence all around.

Then to solve this problem, Brahma Ji took water from his kamandal in his own Anjali and started to praise Lord Shri Vishnu by sprinkling that water in his resolve. Hearing the praise of Brahma Ji, Lord Vishnu immediately appeared in front of him and knowing his problem, Lord Vishnu gave a call to the original mother Adishakti Mata. Due to the call by Vishnu, the primordial primordial power immediately appeared there in the form of Jyoti Punj, when Brahma and Vishnu Ji requested them to overcome this crisis

ब्रम्हा जी तथा विष्णु जी बातों को सुनने के बाद उसी क्षण मूलप्रकृति आदिशक्ति के संकल्प से तथा स्वयं के अंश से श्वेतवर्णा एक प्रचंड तेज उत्पन्न किया जो एक दिव्य नारी के नारी स्वरूप बदल गया। जिनके हाथो में वीणा, वर-मुद्रा पुस्तक एवं माला एवं श्वेत कमल पर विराजित थी। मूल प्रकृति आदिशक्ति के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उस देवी ने वीणा का मधुरनाद किया जिससे समस्त राग रागिनिया संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को ब्रह्म ज्ञान विद्या वाणी संगीत कला की अधिष्ठात्री देवी “सरस्वती” कहा गया।[3]

फिर आदिशक्ति मूल प्रकृति ने पितामह ब्रम्हा से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई ये देवी सरस्वती आपकी अर्धांगिनी शक्ति अर्थात पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं, शिवा शिव की शक्ति हैं उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसी उद्घोषणा कर मूलप्रकृति ज्योति स्वरूप आदिशक्ति अंतर्धान हो गयीं। इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए। पुराण

सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा और वीणावादिनी सहित अनेक नामों से संबोधित जाता है। ये सभी प्रकार के ब्रह्म विद्या-बुद्धि एवं वाक् प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की अधिष्ठात्री देवी भी हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥ शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌। हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌ वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

शुभमुहूर्त: वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा करनी चाहिए।