श्री गोपाल कवच पाठ

मूल: श्री गोपाल कवच पाठ माता पार्वती जी को भगवान शिव के द्वारा सुनाया गया था ।भारतीय वेद शास्त्रों में कष्टों के निवारण हेतु अनेक उपायों का उल्लेख मिलता है, जैसे देवी देवताओं के सिद्ध मंत्र, उनकी विशेष पूजा विधि या तो उनकी स्तुति आदि का विशेष प्रयोग करने पर असाध्य से लगने वाली परेशानियां खत्म हो जाती है । इन्हीं उपायों में से एक हैं भगवान श्री कृष्ण के गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ । यूँ तो भगवान श्री कृष्ण के हजारों नाम है जिनमें से उनका एक गोपाल नाम भी हैं, गोपाल का अर्थ है गाय का पालन करने वाला ।

Origin:Shree Gopal Kavach recitation was recited by Lord Shiva to Lord Parvati. In the Indian Vedas, various remedies are mentioned for the relief of sufferings, such as the Siddha mantras of the Gods and Goddesses, their special worship method or special use of their praise etc. Doing it ends the troubles caused by incurable. One of these remedies is the recitation of Lord Shri Krishna’s Gopal Sahasranama. As such, Lord Shri Krishna has thousands of names, of which he also has a Gopal name, Gopal means cow follower.

पाठ के लाभ: जो भक्त श्री गोपाल कवच का पाठ करता है वह अपने सभी कष्टों और दुखों से मुक्त हो जाता है जो क्लेश उसके दुश्मनों द्वारा या फिर किसी ग्रह के कारण हो रहा हो । ग्रहों की बुरी से बुरी दशा से छुटकारा पाने के लिए या फिर कोई भी मुसीबत जो आप सभी को परेशान कर रही हो उससे बचने के लिए और यदि आप पर कोई नजर लग गई है या कोई जादू टोना हुआ है और या फिर कोई भी बुरी दुष्ट प्रवृत्ति से आपका मन विचलित है तो इन सभी चीजों को समाप्त करने के लिए गोपाल कवचम् का पाठ किया जाता है ।

Benefits of recitation: The devotee who recites the Sri Gopal Kavach is freed from all his sufferings and sorrows that the tribulation is caused by his enemies or some planet. To get rid of the worst of planets or to avoid any trouble that is bothering you all, and if you have got an eye or some witchcraft and or any evil rogue. If your mind is distracted by the trend, then Gopal Kavakham is recited to end all these things.

पौराणिक मान्यता: ऐसी मान्यता हैं कि भगवान श्री कृष्ण का गोपाल नाम बहुत ही अद्भुत, चमत्कारी एवं शुभ फल प्रदान करने वाला है, हमारे ऋषि-मुनियों ने हमेशा गोपाल नाम से ही श्रीकृष्ण के हज़ार नामों की स्तुति की हैं, जिसे शास्त्रों में गोपाल सहस्त्रनाम के नाम से जाना जाता हैं । गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ एकमात्र ऐसा पाठ है जिसे करने से मनुष्य भयंकर से भयंकर रोग से, हर प्रकार के कर्ज से, हर प्रकार की चिंता, अवसाद आदि से मुक्ति पासकता है ।

Mythological Belief: It is believed that the name Gopal of Lord Krishna is very amazing, miraculous and auspicious, our sages have always praised the thousand names of Shri Krishna by the name of Gopal, which is called Gopal Sahastranam in the scriptures. Are known The text of Gopal Sahastranam is the only text that a person can get rid of from every kind of severe disease, from all kinds of debt, from all kinds of anxiety, depression etc.

॥ श्रीगोपालकवचम् ॥

अथ वक्ष्यामि कवचं गोपालस्य जगद्गुरोः । यस्य स्मरणमात्रेण जीवनमुक्तो भवेन्नरः ॥ १ ॥ श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय । नारदोऽस्य ऋषिर्देवि छंदोऽनुष्टुबुदाह्रतम् ॥ २ ॥
देवता बालकृष्णश्र्च चतुर्वर्गप्रदायकः । शिरो मे बालकृष्णश्र्च पातु नित्यं मम श्रुती ॥ ३ ॥ नारायणः पातु कंठं गोपीवन्द्यः कपोलकम् । नासिके मधुहा पातु चक्षुषी नंदनंदनः ॥ ४ ॥
जनार्दनः पातु दंतानधरं माधवस्तथा । ऊर्ध्वोष्ठं पातु वाराहश्र्चिबुकं केशिसूदनः ॥ ५ ॥< ह्रदयं गोपिकानाथो नाभिं सेतुप्रदः सदा । हस्तौ गोवर्धनधरः पादौ पीतांबरोऽवतु ॥ ६ ॥
करांगुलीः श्रीधरो मे पादांगुल्यः कृपामयः । लिंगं पातु गदापाणिर्बालक्रीडामनोरमः ॥ ७ ॥ जग्गन्नाथः पातु पूर्वं श्रीरामोऽवतु पश्र्चिमम् । उत्तरं कैटभारिश्र्च दक्षिणं हनुमत्प्रभुः ॥ ८ ॥
आग्नेयां पातु गोविंदो नैर्ऋत्यां पातु केशवः । वायव्यां पातु दैत्यारिरैशान्यां गोपनंदनः ॥ ९ ॥ ऊर्ध्वं पातु प्रलंबारिरधः कैटभमर्दनः । शयानं पातु पूतात्मा गतौ पातु श्रियःपतिः ॥ १० ॥
शेषः पातु निरालम्बे जाग्रद्भावे ह्यपांपतिः । भोजने केशिहा पातु कृष्णः सर्वांगसंधिषु ॥ ११ ॥ गणनासु निशानाथो दिवानाथो दिनक्षये । इति ते कथितं दिव्यं कवचं परमाद्भुतम् ॥ १२ ॥
यः पठेन्नित्यमेवेदं कवचं प्रयतो नरः । तस्याशु विपदो देवि नश्यंति रिपुसंधतः ॥ १३ । अंते गोपालचरणं प्राप्नोति परमेश्र्वरि । त्रिसंध्यमेकसंध्यं वा यः पठेच्छृणुयादपि ॥ १४ ॥
तं सर्वदा रमानाथः परिपाति चतुर्भुजः । अज्ञात्वा कवचं देवि गोपालं पूजयेद्यदि ॥ १५ ॥ सर्व तस्य वृथा देवि जपहोमार्चनादिकम् । सशस्रघातं संप्राप्य मृत्युमेति न संशयः ॥ १६ ॥

॥ इति नारदपंचरात्रे ज्ञानामृतसारे चतुर्थरात्रे श्रीगोपालकवचं संपूर्णम् ॥